Posts

Showing posts from August, 2022

सिंह तिवारी की उपाधि दी है। भर वंश के राजा २४९ ई॰ में कृष्णराज का शासन था। चौथी सदी में यहाँ नाग शासको का राज्य स्थापित हुआ, जिन्होंने नीलकंठ महादेव का मन्दिर बनवाया।

Image
  कालिंजर दुर्ग, भरो के नाम 👇👇👇👇👇👇 भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में स्थित एक दुर्ग है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विंध्य पर्वत पर स्थित यह दुर्ग विश्व धरोहर स्थल खजुराहो से ९७.७ (97.7) कि॰मी॰ दूर है। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। इस दुर्ग में कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें कई मन्दिर तीसरी से पाँचवीं सदी गुप्तकाल के हैं। यहाँ के शिव मन्दिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मन्थन से निकले कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यहीं तपस्या कर उसकी ज्वाला शान्त की थी। कुछ कलाकृतियां राजा वीरसेन भारशिव की भी पाई जाती हैं  कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला कार्तिक मेला यहाँ का प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव है। इस किले पर भर शासक थे,कहा जाता है कि इस किले को कोई भर शासको से जीत नहीं पाता था, जब व्याघ्रदेव उनके यहां तीर्थयात्रा पर आये थे। तब भर (राजभर) राजा ने अनुरोध किया की उनकी एक रियासत गहोरा पर लोधी ने कब्जा कर लिया है। इसे मुक्त करा दे उन्होंने उस रियासत को मुक्त करने हेतु अपने दोनों पोतो को भर राजा के साथ मिलकर लड़ने को कहा पर लोधी राजा...

लाने लगे थे। इसमें संदेह नहीं कि, शिव के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए ये राजा निशान के रूप में शिवलिंग को अपने सिर रखा करते थे। इस प्रकार की एक मूर्ति भी उपलब्ध हुई है। जो इस अनुश्रृति की पुष्टि भी करती है। नवनाग (दूसरी सदी के मध्य में) से भवनाग (तीसरी सदी के अन्त में) तक इनके कुल सात राजा हुए, जिन्होंने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में काशी में दस बार अश्वमेध यज्ञ किये। और भारतवर्ष को एक अपनी नई पहचान दिया। सम्भवत: इन्हीं दस यज्ञों की स्मृति काशी के 'दशाश्वमेध-घाट' के रूप में अब भी सुरक्षित है। भारशिव भर राजाओं का साम्राज्य पश्चिम में मथुरा और पूर्व में काशी से भी कुछ परे तक अवश्य विस्तृत था। इस सारे प्रदेश में बहुत से उद्धार करने के कारण गंगा-यमुना को ही उन्होंने अपना राजचिह्न बनाया था। गंगा-यमुना के जल से अपना राज्याभिषेक कर इन राजाओं ने बहुत काल बाद इन पवित्र नदियों के गौरव का पुनरुद्धार किया था। राजा वीरसेन भारशिव भर भारशिव राजाओं में सबसे प्रसिद्ध राजा वीरसेन भर थे। कुषाणों को परास्त करके अश्वमेध यज्ञों का सम्पादन उसी ने किये थे। उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद ज़िले में एक शिलालेख मिला है, जिसमें इस प्रतापी राजा का उल्लेख है। सम्भवत: इसने एक नये सम्वत का भी प्रारम्भ किये थे।

 

भारत वर्ष में विशाल भारशिव भर शासन करते थे भर वंश के

  बहुत प्रतापी शूरवीर भर क्षत्रिय राजा थे,अपने जीते जी भरताज को खत्म नहीं होने दिया। रायबरेली गजेटियर में पृष्ठ 262 उल्लेख किया गया है अमर सिंह बघेल ने इनकी वीरता का परिचय स्वर्ण अक्षरों में अंकित किया है इनका शासनकाल 15 वी. शताब्दी में माना जाता है,, भारत वर्ष में विशाल भारशिव भर शासन करते थे भर वंश के राजा बड़े प्रतापी शुरवीर ऐश्वर्य शाली और योद्धा थे। जिन्होंने अपने बाहुबल और पराक्रम से देश पर आक्रमण करने वाली शक, कुषाण, यवन आदि विदेशी जातियों को मार भगाने में समर्थ हुए हैं यह लोग वर्तमान मथुरा इलाहाबाद अवध मिर्जापुर काशी वगैरह में रियासतें स्थापित कर सदियों राज्य करते रहे हैं क्योंकि यह लोग पहले शैव संप्रदाय के अनुयाई थे अतएव शिव जीके परम उपासक होने के कारण ये लोग प्रारंभ में भारशिव नाम से विख्यात हुए तत्पश्चात यही राजभर और भर जाति के नाम से प्रसिद्ध हुए ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर कुछ लोगों का विचार इस प्रकार है कि जिस समय शक, हुण आदि विदेशी जातियों का आक्रमण उत्तर भारत में होना शुरू हुआ इन वीर भर सरदारो ने उन मलक्ष्यों को देश की सीमा से बाहर निकाल देने का भार अपने सर पर लिया उ...

ऐसे तिरंगे को सदा दिल में बसाये रखना

 🚩 🚩🇳🇪🇳🇪दो सलामी इस तिरंगे को, जिस से तुम्हारी  शान हैं,सिर हमेशा ऊंचा रखना इसका जब तक दिल में जान है ये बात हवाओ को बताये रखना, रोशनी होगी चिरागों को जलाये रखना, लहू देकर जिसकी हिफाजत हमने की ऐसे तिरंगे को सदा दिल में बसाये रखना  स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये। जय हिंद.
  भारशिव नाग राजा' शैव धर्म को मानते थे। इनके  प्रमुख राजा ने शिव को प्रसन्न करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते हुए शिवलिंग को अपने सिर पर धारण किया था, अपने धर्म का प्रचार प्रसार किया, इसलिए ये भारशिव भी कहलाने लगे थे। इसमें संदेह नहीं कि, शिव के प्रति अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए ये राजा निशान के रूप में शिवलिंग को अपने सिर रखा करते थे। इस प्रकार की एक मूर्ति भी उपलब्ध हुई है। जो इस अनुश्रृति की पुष्टि भी करती है। नवनाग (दूसरी सदी के मध्य में) से भवनाग (तीसरी सदी के अन्त में) तक इनके कुल सात राजा हुए, जिन्होंने अपनी विजयों के उपलक्ष्य में काशी में दस बार अश्वमेध यज्ञ किये। और भारतवर्ष को एक अपनी नई पहचान दिया। सम्भवत: इन्हीं दस यज्ञों की स्मृति काशी के 'दशाश्वमेध-घाट' के रूप में अब भी सुरक्षित है। भारशिव भर राजाओं का साम्राज्य पश्चिम में मथुरा और पूर्व में काशी से भी कुछ परे तक अवश्य विस्तृत था। इस सारे प्रदेश में बहुत से उद्धार करने के कारण गंगा-यमुना को ही उन्होंने अपना राजचिह्न बनाया था। गंगा-यमुना के जल से अपना राज्याभिषेक कर इन राजाओं ने बहुत काल बाद इन पवित्र नदि...