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Showing posts from November, 2022

जहाँ पर भर जहाँमहारानी कुन्ता की टकसाल थी वहां उन्होंने पारिजात या कल्प वृक्ष का रोपण किया था।

  हमारे पूर्वाग्रहों के कारण इतिहास की बहुत सी बातें परदे के पीछे छिपी रह जाती हैं। जब आपसे कोई लखनऊ के नाम करण के बारे में जानना चाहेगा, तब आप कहेंगे कि दषरथ पुत्र लखन के नाम पर लखनपुरी बसाई गई, और उसी का बिगड़ा हुआ रूप लखनऊ है। बहराइच के नामकरण की बात चलेगी तब आप कहेंगे कि ब्रह्मा जी ने वहां पर तप किया था, ब्रह्माइच का बिगड़ा हुआ रूप बहराइच है। जबकि सत्य यह है कि लखन भर के नाम पर लखनपुरी बसाई गई, और उसका बिगड़ा रूप लखनऊ है।वीर लड़ाकू भर जाति के नाम पर भर-राइच,भराइच,बहराइच नगर बसा है।लेकिन क्या करें हमारी पौराणिक सोच खींचतान कर पौराणिक पात्रों से साम्यता स्थापित कर ही देती है।        ऐसा ही कुछ बाराबंकी जिला मुख्यालय से चालीस किलोमीटर दूर स्थित किन्तूरनगर ;किन्तौर,कुन्तौरद्ध, कुन्तीष्वर मन्दिर,एवं पारिजात वृक्ष के विषय में पूर्वाग्रहों का सहारा लिया गया है। किन्तूर बाराबंकी जिले की सिसौली गौसपुर तहसील में स्थित है। कुछ समाचार पत्रों में किन्तूर मन्दिर का रहस्य बताते हुए छापा गया है कि षिवलिंग को सबसे पहले कुन्ती ही पूजती है। समाचारपत्रों में कहा गया है कि पाण्डव ज...

भारशिव नागवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा बीजली राजभर बारहवीं शताब्दी राजभर राजाओं के साम्राज्य के लिए बहुत

  भारशिव नागवंशी क्षत्रिय सम्राट महाराजा बीजली राजभर बारहवीं शताब्दी राजभर राजाओं के साम्राज्य के लिए बहुत अशुभ साबित हुई। इसी शताब्दी के अन्तिम वर्षों में अवध के सबसे शक्तिशाली राजभर महाराजा बिजली वीरगति को प्राप्त हुए थे। सन् 1194 ई. में इससे पहले राजा लाखन राजभर भी वीरगति को प्राप्त हुए। महाराजा बिजली राजभर की माता का नाम बिजना था, इसीलिए उन्होंने सर्वप्रथम अपनी माता की स्मृति में बिजनागढ की स्थापना की थी जो कालांतर में बिजनौरगढ़ के नाम से संबोधित किया जाने लगा।महाराजा बिजली राजभर के कार्य शेत्र में विस्तार हो जाने के कारण बिजनागढ में गढ़ी का समिति स्थान पर्याप्त न होने के कारण बिजली राजभर ने अपने मातहत एक सरदार को बिजनागढ को सौंप दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पिता की याद में बिजनौर गढ़ से उत्तर तीन किलोमीटर की दूरी पर पिता नटवा के नाम पर नटवागढ़ की स्थापना की।यह किला काफी भव्य और सुरक्षित था। महाराजा बिजली राजभर की लोकप्रियता बढ़ने लगी और अब तक वह राजा की उपाधि धारण कर चुके थे। नटवागढ़ भी कार्य संचालन की द्रिष्टि से पर्याप्त नहीं था, उसके उत्तर तीन किलोमीटर एक विशाल किले का निर...