राजा इंदूभर और कालिका मंदिर का इतिहास
अगर राजभर हो तो अपना इतिहास जानो
राजा इंदूभर और कालिका मंदिर का इतिहास
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नाम इंदुपुर संभवतः राजा "इंदु"भर केनाम से उत्पन्न हुआ है। जो 688 ईसा विक्रम संवत 745 के दौरान एक स्वतंत्र शासक के रूप में इन्दुपुर में शासन करते थे।
इतिहास
इंदुपुर एक ऐतिहासिक गाँव है, जहां कालिका भवानी गाँव के दक्षिण में एक विशाल मंदिर है । मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में पुराने ईंटों के बिखरे हुए ढेर मौजूद हैं जिन्हें देखा जा सकता है जो कि एक राजा के लिए ज्ञात / गढ़ रहा होगा। कई विद्वानों के अध्ययन से यह पता चला है कि जांच की गई वर्ष 688 ईसा पूर्व संवत 745 के दौरान, इस क्षेत्र पर एक स्वतंत्र राजा "इंदु राजभर" का शासन था। राजा "इंदु"भर एक स्वतंत्र शासक के रूप में यहां शासन करते थे, और उनका क्षेत्र दक्षिण में 7 किमी, उत्तर में 16 किमी, पूर्व में देवरिया तक और पश्चिम में चौरी चौरा तक बढ़ाया गया था। इन्दुपुर को राजा "इंदु राजभर" ने बसाये थे। इसलिए उस गांव का नाम राजा इंदु भर के सम्मान पर रखा गया था। लोगों का यह भी कहना है कि यदि राजा "इंदु" हो तो पूर्वजों के बाद से इंद्र पर शासन किया जाता था।
राजभर शासक इन्दू भर (इन्दूपुर देवरिया )
(645 ईस्वी से 702 ईस्वी तक)
(लेखक-ःश्री रामचन्द्र राव,
जिला-ः गोरखपुर उ.प्र.)
जिला देवरिया मुख्यालय के पश्चिम गौरी बाजार एक रेल्वे स्टेशन है ! गौरी बाजार से रुद्रपुर मार्ग पर किलोमीटर 4 पर सड़क के पश्चिम इन्दूपुर ग्राम है ! इन्दूपुर गांव ऐतिहासिक गांव है ! गांव के दक्षिण कालिका भवानी का विशाल मन्दिर है ! मन्दिर के दक्षिण पश्चिम दिशा में मन्दिर के पास ही बिखरे हुए पुराने लखोरी ईंटों का ढेर आज भी मौजूद है ! जिसके अवलोकन से लगता है कि यहां पर बहुत पहले किसी राजा का गढ़ रहा होगा। किदवदन्ती है कि विक्रमी संवत् 745 अर्थात सन 688 में यहां पर इन्दू भर नामक राजा का शासन था ! राजा इन्दू भर यहां पर एक स्वतंत्र शासक के रूप में शासन करते थे ! राजा इन्दू का राज्य उत्तर दिषा में इन्दूपुर से 20 किलोमीटर तक तथा दक्षिण में 9 किलोमीटर तक पूरब में देवरिया तथा पश्चिम में चौरीचौरा तक विख्यात था। आज भी यह जनश्रुति प्रचलित है कि इन्दूपुर को राजभर शासक इन्दू ने बसाया था और उन्हीं के नाम पर इसका नाम इन्दूपुर पड़ा ! लोग कहते हैं कि इन्दू भर के पूर्वजों के समय से ही यहां पर राजभरों का शासन रहा है !
राजा इन्दू के समय में इन्दूपुर के दक्षिण रुद्रपुर में राजा लवंगदेवा का शासन था । राजा लवंगदेव के समय लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारत में राजा हर्ष का शासन था।
राजा इन्दू को अपने राज्य के साथ दो। और तप्पा मिल जाने के से उनका राज्य विस्तृत हो गया ! राजा इन्दू के यश में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी ।
सन 647 ईस्वी में राजा हर्ष का देहान्त हो गया ! राजा हर्ष के मरते ही पूरे उत्तर भारत में अराजकता की लहर दौड़ गई। जिन राजाओं की रियासतें चली गई थीं वे उसी समय सैन्य शक्ति सशक्त हो जाने पर महिमाशाह को अपने पैतृक राज्य रुद्रपुर की याद आने लगी ! महिमाशाह ने अपने दोनों भाइयों को रुद्रपुर की रियासत पुनः वापस लेने हेतु प्रशिक्षित घुड़सवारों के साथ एक सैन्यदल रुद्रपुर को भेजा । सर्वप्रथम रुद्रपुर पर आक्रमण किया ! इस अप्रत्याशित आक्रमण से रुद्रपुर की रियासत पर कब्जा जमाये विश्वसेन राजकुमार घबड़ा गया। और रात्रि के समय रुद्रपुर को छोड़कर सरयू नदी की तरफ भागकर अपना जान बचाया ! रुद्रपुर पर कब्जा करने के पश्चात इन्दूपुर पर आक्रमण किया ! उस समय इन्दूपुर पर राजभर शासक इन्दू का शासन था ! राजा इन्दू ने बुद्धिमानी से काम लिया ! महिलोचन से युद्ध न करके आपस में समझौता कर लिया ! समझौते के अनुसार राजा इन्दू को इन्दूपुर से उत्तर 20 किलोमीटर तथा दक्षिण में 9 किलोमीटर पष्चिम में तरकुलहां तथा पूरब में देवरिया तक इलाका इन्दू भर को मिला। इस घटना को श्री अयोध्याप्रसाद गुप्त ने निम्नलिखित प्रकार से उल्लेख किया है-ः
‘‘ उत्तर भारत की अशान्ति व्यवसथा देखकर महिमाशाह ने जो उस समय गढ़वाल के श्रीनगर में शासन कर रहे थे। अपने दोनों भाइयों महिलोचनशाह और चन्द्रभानशाह को एक प्रशिक्षित घुड़सवार सेना की टुकड़ी के साथ अपने पैतृक राज्य रुद्रपुर पर पुनः अधिकार करने के लिए भेजा । महिलाचनशाह अपने सैनिकों के साथ गोरखपुर आये ! आते ही सबसे पहले उन्होंने रुद्रपुर पर आक्रमण किया ! मझौली का विश्वसेन राजकुमार जो उस समय रुद्रपुर पर अपना अधिकार जमाये बैठा था श्रीनेतों के अप्रत्याशित आक्रमण से घबरा गया ! वह मध्य रात्रि में बिना लडे ही चुपके से सरयू नदी के कछार में भाग गया ! रुद्रपुर के उत्तर का इलाका उस समय इन्दू भर के आधीन था ! इन्दू भर चालाक व दूरदर्षी शासक थे। महिलोचनशाह ने इन्दू भर के इस व्यवहार से प्रसन्न होकर उसे गुजारे के लिए रुद्रपुर से ढाई कोस उत्तर पर 5 कोस का इलाका दिया।
समाचारपत्र दैनिक जागरण गोरखपुर 9 सितम्बर 1997 पृष्ठ 5 ष्शीर्षक अतीत का आईना ,
लेखक -अयोध्याप्रसाद गुप्त ने क्या कहते हैं
तब से इन्दूपुर में राजा इन्दू भर का शासन अनवरत सन् 702 तक चलता रहा ! सन 702 ईस्वी में इन्दू भर का देहान्त हो गया ! जनश्रुति है कि इन्दूपुर में राजा इन्दू भर के पहले उनके पूर्वजों तथा उनकी मृत्यु के बाद उनके वंशजों का शासन रहा है। राजा इन्दू भर के वंशजों में वर्तमान समय में श्री रामकेवल, श्री रामबृक्ष और बहीर उर्फ सर्कस व शिवपूजन आदि मौजूद हैं , ये लोग वर्तमान इन्दूपुर गांव के भर टोलिया में रहते हैं ! आज इनकी आर्थिक स्थिति दयनीय है ! राजा इन्दू के कुछ वंशज फाजिलनगर कुशीनगर में बस गये हैं ! राजा इन्दू के विषय में अधिक जानकारी के लिए शोधकार्य की आवश्यकता है।
राजा इन्दू का शासनकाल-
इस प्रकार मेरे विचार से इन्दूपुर पर राजा इन्दू का शासनकाल 645 से 702 ईस्वी तक था। प्रसिद्ध इतिहासकार एम.बी. राजभर के अनुसार 17वी. ईसा पूर्व तक समस्त इन्दूपुर पर महाराजा इन्दू भर के वंशजों का शासन रहा है।
इन्दूपुर की कालिका भवानी और महाराजा इन्दू राजभर से क्या ताल्लुक है...
देवरिया जनपद में गौरी बाजार से दक्षिण रुद्रपुर मार्ग पर गौरी बाजार से 4 किलोमीटर पर इन्दूपुर गांव स्थित है। गांव के दक्षिण मुख्य मार्ग से पष्चिम लगभग एक किलोमीटर पर एक प्राचीन इन्दूपुर के कालिका भवानी का मन्दिर है। यह मन्दिर लगभग 3 एकड़ भूमि में विख्यात है। इन्दूपुर के कालिका भवानी का मन्दिर प्राचीनता ,पवित्रता तथा महात्मय के लिए देवरिया जनपद में विख्यात है। मुख्य मन्दिर के दक्षिण पष्चिम कोण पर भैरों बाबा की प्राचीन मूर्ति है और वहीं बगल में एक प्राचीन बट वृक्ष है मन्दिर के पूर्वोत्तर कोण पर हनुमान जी की मूत्रि स्थापित है। जिसमें देवी जी की पिण्डी बनी हुई है और वहीं बगल में तीन बड़ी बड़ी हथनियां सीमेन्ट की बनी हुई हैं। मन्दिर के पष्मिोत्तर दिशा में पहले एक तालाब था। परन्तु वर्तमान में वह तालाब पक्का और उसके चारों तरफ सीढ़ी बनवा दिया गया है। तालाब के पूर्वी तट पर एक पंक्ति में चार तथा तालाब के मध्य एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया गया है। तालाब के मध्य का मन्दिर अभी निर्माणाधीन है । ये सभी मन्दिर पूर्वाभिमुख हैं ! ज्यादातर मन्दिरों में शंकर व पार्वती की मूर्ति रखी गई । कुछ मन्दिर का गर्भगृह अभी खाली पड़ा है । इन्दूपुर के कालिका भवानी के प्राचीन मन्दिर जिसमें माता जी की पिंडी है। राजा इन्दू भर ने बनवाया था। राजा ने स्नान हेतु बगल में एक तालाब भी खुदवाये थे।
और यहीं पर उनकी राजधानी थी। जिसके कारण इस गांव का नाम उनके नाम पर इन्दूपुर पड़ा और मन्दिर का नाम इन्दूपुर की कालिका भवानी मन्दिर पड़ा। यहां जनश्रुति प्रचलित है कि राजा इन्दू भर काली मां के परम भक्त थे। इस मन्दिर में सुबह शाम पूजा अर्चना करना उनका नित्य का नियम था। लोग कहते हैं कि एक बार राजा इन्दू राजभर तीर्थ के नियत से कलकत्ता गये हुए थे। कलकत्तावाली कालिका भवानी का दर्शन पाकर भर राजा के मन में बहुत शान्ति मिली। राजा इन्दू भर ने कलकत्ता की कालिका भवानी के मन्दिर की भव्यता पवित्रता तथारमणीयता और मन्दिर का प्राकृतिक सौंदर्य देखकर वहीं मन्दिर में महीनों रह गये। महीनों माता जी के मन्दिर में घंटों ध्यान मग्न रहते थे। और प्रतिदिन कलकत्ता वाली कालिका भवानी को अपने राज्य चलने का अनुरोध विन्ती करते रहते थे। लोग कहते हैं कि माता जी की मूरत ळाले ही काली बनाई जाती है परन्तु माता जी का दिल अपने भक्तों के प्रति मन्शा स्वच्छ रहा है ! एक रात कालिका भवानी ने राजा को स्वप्न में दर्षन दिया।
और कहा कि मैं आपके भक्ति-भाव से सन्तुष्ट हूं तथा आपके राज्य में चलने को तैयार हूं ! परन्तु मेरी षर्त यह है कि मैं आपकी कुलदेवी के रूप् में आपके गढ़ के करीब रहूंगी ! ध्यान रहे मेरे मन्दिर की देखभाल व सेवा टहल का कार्य आपके राजभर परिवार के लोग ही करेंगे । अन्य के द्वारा मेरी पिण्डी/मूर्ति को छूना तक मुझे पसन्द नहीं है ! जिस दिन तेरा या मेरे मन्दिर की उपेक्षा की गई उस दिन आपके परिवार का अनिष्ट हो जायेगा और राज्य का पतन भी हो जायेगा ! राजा इन्दू ने यह सोचकर कि जिसके ऊपर कालिका भवानी का वरदहस्त हो उसका कोई क्या बिगाड़ पायेगा।
माताजी की शर्त को स्वीकार कर लिया ! राजा ने कलकत्ता की कालिका भवानी के निर्देषानुसार कार्य किया।
और वहां से पिण्डी लाकर अपने गढ़ के चहारदीवारी के मध्य कालिका भवानी की पिण्डी स्थापित की। तथा कालिका भवानी का एक भव्य मन्दिर का निर्माण करवाया। बगल में एक तालाब भी खुदवाया ! कालिका भवानी मां राजा इन्दू भर के परिवार में कुलदेवी के रूप में पूजी जाने लगी ! सातवीं सदी से लेकर आज तक यह देवी राजभरों की कुलदेवी के रूप में पूजनीय रही है ! जब तक यहां राजभरों का शासन था।
किले के चहारदीवारी के अन्दर मन्दिर होने के कारण केवल राजभर क्षत्रिय राजपरिवार के लोग ही मन्दिर में पूजा करते थे ,इन्दुपुर से राजभरों के सत्तापतन के बाद यहां के क्षेत्रिय जनता भी इस मन्दिर में पूजा अर्चना करने लगी।
परन्तु आज भी मन्दिर में पुजारी का कार्य राजभर ही करते हैं! परन्तु आज यहां कोई किला नहीं है जमींदोज हो गया है। परन्तु, पुराने लखोरी ईंटों के ढेर बिखरे हुए हैं ,जो यहां कभी किसी निर्मित भवन/किला होने की तरफ इशारा करते हैं। इस मन्दिर में भक्तों की मनोकामना पूरी होने के कारण यह मन्दिर श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का केन्द्र बना हुआ है ! कहते हैं कि मनोवांछित मनोकामना पूरी करने वाली ममतामयी कालिका भवानी के मन्दिर में सच्चे मन से अर्ज करने वाले भक्त कभी निराष नहीं लौटते हैं । जिन जिन प्रतिष्ठित लोगों की मनोकामना इस देवी मां के दया दृष्टि से पूरी हुई है वे लोग इस मन्दिर के परिसर में अपना अलग अलग मन्दिर का निर्माण करवाये हैं । इन मनमोहक मन्दिरों की संख्या 9 है । कालिका भवानी मां का मन्दिर तथा बगल में 9 अत्यन्त सुन्दर मनभावन मन्दिर परिसर की रमणीयता एवं प्राकृतिक सौंदर्य ने मन्दिर के आकर्षण में चार चांद लगा दिए हैं !
किंम्वदन्ती है कि पुराना मन्दिर को नयेरुप में निर्माण करवाया जा रहा था ,उसी समय पुराने मन्दिर के कुछ लकड़ी का कार्य भी चल रहा था। लकड़ी का कार्य गणेष लोहार निवासी वसदेवा कर रह थे ! संयेग से कांटी ठोंकते समय गनेष लोहार का हाथ माता जी की मूर्ति से टकरा गया ! उसी समय गनेष लोहार के हाथ में कई जगहों पर खरोंच जैसे चिन्ह खिाई देने लगा। उस खरोंच वाले स्थान से खून की बूंदें टपकने लगीं। गनेष लोहार तथा अन्य उपस्थित लोग यह आष्चर्यचकित करने वाली घटना देखकर अनहोनी की आशंका से घबड़ा गये। यह खबर आग की तरह पूरे क्षेत्र में फैल गई। मन्दिर में श्रद्धालुओं का तांता लग गया ! सभी लोग पूजा अर्चन कर देवी को मनाने में लग गये ! मन्दिर के परिसर में माता जी के यषोगान तथा भजन कीर्तन से आकाश गुंजायमान हो गया ! परन्तु खून का टपकना बन्द नहीं हुआ ! तंत्र-मंत्र के जानकार विद्वत्जनों तथा काली मां के सेवकों (सोखा) ने बताया कि इन्दूपुर की कालिका भवानी राजभरों की कुलदेवी है अतः यदि राजा इन्दू भर के वंषज या कोई राजभर आकर माता जी को मनाये तो माता जी की क्रोधाग्नि शान्त होगी ! अन्यथा कुछ भी अनहोनी हो सकता है ।
साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया है कि माता जी किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अपनी मूरत छू जाना पसन्द नहीं कर रहीं हैं । मन्दिर के पष्चिम एक भरटोलिया टोला है। यह इन्दूपुर ग्राम सभा का एक टोला है। यहां आज भी राजा इन्दू भर के अवशेष मौजूद हैं । उनके पूर्वज तो इन्दूपुर के राजा थे, राजभरो को बुलाया गया । वे माता जी के सामने सुबह से शाम तक हाथ जोड़े विनती करते रहे। अन्ततः अपने भक्तों की पुकार ,अनुनय विनय तथा अपने भक्तों पर सदा ही दया की वृष्टि करने वाली मां कालिका भवानी का ह्रदय जागरित हो गया।
और गनेष लोहार के हाथ से खून टपकना बन्द हो गया । क्षेत्र की जनता ने संतोष की सांस लिया । उपस्थित जनसमूह द्वारा देवी के जयकारों से आकाश गुज उठा । तब से इन्दुपुर की कालिका भवानी के यश में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई ! माता की मूर्ति/पिण्डी को नये मंदिर में स्थापित करना था। इस कार्य का सम्पादन सुविख्यात बाबा रामदास जी कर रहे थे । कहते हैं कि कुछ लालची प्रवृत्ति के लोगों मन्दिर की सम्पत्ति और चढ़ावे को लेकर मन में लालच आ गया । वहीं कुछ सम्भ्रान्त लोग इस मन्दिर के स्वामित्व को अपने वर्ग के लोगों को सौंपना चाह रहे थे । अन्दर अन्दर खिचड़ी पकने लगी ! परन्तु जिस समय पुराने मन्दिर से माता जी की मूर्ति/पिण्डी उठाकर नये मन्दिर में लाकर स्थापित करने की बात आई तो उस समय गनेष लोहार के साथ घटित घ्टना की याद आते ही अनहोनी की आशंका से किसी की भी हिम्मत मूर्ति /पिण्डी छूने की नहीं हुई । मूर्ति स्थापना का मुहूर्त 10 बजकर 15 मिनट पर निर्धारित था। परन्तु किसी ने मूर्ति /पिण्डी उठाकर नये मन्दिर में ले जाने की बात तो दूर उसे छूने तक का साहस नहीं किया ! तुहूर्त बीता जा रहा था ! अन्त में थक हारकर राजा इन्दू भर के वंषजों को बुलाने को कहा गया । इस समय राजा इन्दू के वंषज रामकेवल, रामबृक्ष व वहीर उर्फ सरकास आदि घर पर मौजूद थे । परन्तु साजिष के तहत उनको नहीं बुलाया गया था । स्थानीय संभ्रान्तों का मंदिप में बढ़ते प्रभाव के कारण ये लोग उस दिन नहीं आये थे । तीनों भाई मन्दिर पर उपस्थित हुए । वहीर उर्फ सर्कस ने पहले कालिका भवानी का हाथ जोड़कर स्मरण किया और अनुनय विनय के प्ष्चात मूर्ति/पिण्डी को उठाकर बाबा रामदास के निर्देषानुसार मन्दिर की पांच बार परिक्रमा करके विधिवत वेद मन्त्रों के उच्चारण के मध्य मन्दिर के गर्भगृह में मूर्ति /पिण्डी स्थापित कर दिया । कालिका भवानी के जयकारों से गगन गूंज उठा और भक्तों में खुषी की लहर दौड़ गई । फिर भी स्थानीय संभ्रान्तों ने एक नागा बाबा को यहां का महन्थ बना दिया । नागा बाबा पर ‘‘मन ना रंगाये बाबा रंगाय लिए चोला-- चरितार्थ हुआ । नागा बाबा कुछ वर्षों बाद अपने असली रूप में प्रकट हुए और मन्दिर तथा मन्दिर परिसर की भूमि अपने नाम पर कराने के लिए तहसील के लेखपाल के पास पहुंच गये । इस मन्दिर के प्रति श्र’द्धावान लेखपाल ने इस षणयंत्र से ग्राम इन्दूपुर के सम्भ्रान्तों तथा प्रधान को अवगत कराया । क्षेत्रीय जनता तथा सम्भ्रान्त लागों के हस्तक्षेप से नागा बाबा अपने नापाक मकसद में सफल नहीं हुए । इस मन्दिर में जो चढ़ावा आता है वह रामकेवल राजभर , रामबृक्ष तथा बहीर राजभर को मिलता है और जो चढावा बाबा के गद्दी पर चढ़ता है वह नागा बाबा लेते हैं । समय समय पर रामकेवल राजभर ,रामबृक्ष व बहीर राजभर इस मन्दिर के पुजारी का कार्य करते हैं यहां आज भी प्रत्येक सोमवार व शुक्रवार को श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है । रामनवमीं में नौ दिन तथा अन्तिम दिन विशाल मेला लगता है । लोग बताते हैं कि इस क्षेत्र के श्री प्रमोदसिंह विधायक का चुनाव लड़ रहे थे ,उन्होंने इन्दूपुर की कालिका भवानी के मन्दिर में मनौती माना कि अगर हम विधायक चुन लिए जाते हैं तो माताजी के मन्दिर का जीर्णोद्धार करायेंगे । इन्दूपुर की कालिका भवानी का श्री प्रमोदसिंह पर कृपा-दृष्टि हुई और वे चुनाव जीत गये । श्री प्रमोदसिंह विधायक चुन लिए जाने पर सपरिवार सर्वप्रथम माताजी के मन्दिर में आकर माताजी का दर्शन किये। फिर लखनऊ जाकर शपथ ग्रहण किया। श्री प्रमोदसिंह 9 लाख 96 हजार की लागत से इस मन्दिर का जीर्णोद्धार कराये जो वहां पर लगे शिलालेख से स्पष्ट है । यह है राजभर षासक इन्दू के कुलदेवी इन्दूपुर की कालिका भवानी का इतिहास अमर है
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